Bhaja Govindam(hindi version)

भज गोविन्दम, भज गोविन्दम,

गोविन्दम भज मूदा माथे,

सम्प्रप्ठे संनिहिठे काले,

नहीं नहीं रक्षाठी दूकृन्ज करने (भज गोविन्दम…..)


धिनामापी रजनी, सायं प्रथा,

सिसिर वसन्थौ पुनारयाथा,

कला क्रीदाठी गाचत ययु,

स्थादापी न मुन्जथ्यासा वायु (भज गोविन्दम…..)


अग्रे वह्नी, प्रसहते भानु,

रथ्रौ चिबुक समिर्पिथा जणू,

कराथाला बिक्षा तरु थाला वसा

स्थाधापी न मुन्जथ्यसपसा. (भज गोविन्दम…..)


यावाद्विठो पर्जन सकता,

स्थावंनिजा परिवारों रक्ता

पश्चात जीवाठी जराज्जारा देहे,

वर्थाम प्रुच्चाठी को अपिना गेहे. (भज गोविन्दम…..)


जटिलो मुंदी लुन्चिथा केसा,

काशायाम्बरा बहु कृता वेष,

पस्यन्नापी च न पस्याठी लोका

ह्युधरा निमित्तं बहु कृता सोका. (भज गोविन्दम…..)


बगावत गीता किंचिद अधीता,

गंगाजलालावा कनिका पीठ,

सुकृधापी यस्य मुरारी समर्चा,

तस्य यामा किम कुरुठे चर्चाम. (भज गोविन्दम…)


अंगम गलिथं पलिथं मुन्दम,

दसनाविहीनाम जथाम ठुन्दम,

वृद्धो यथि गृहीता धन्दम,

तदपि न मुन्जथ्यासा पिंदम (भज गोविन्दम…)


बलास्थावत क्रीदासक्था,

स्थारुनास्थावाथ थारुनी सकता,

वृधा स्तावाथ चिंता मग्न,

परमे ब्रह्मणि कोपी न लग्न (भज गोविन्दम…)


पुनरपि जनानाम पुनरपि मरणं,

पुनरपि जननी जतारे सयानम,

इह संसारे खलु दुस्थारे,

कृपया परे पाहि मुरारे. (भज गोविन्दम…..)


पुनरपि रजनी, पुनरे दिवस,

पुनरिप पक्ष, पुनरपि मासा,

पुनाराप्यायानाम, पुनरपि वर्षम,

तदपि न मुन्जित्यासामार्षम. (भज गोविन्दम…..)


वायसी गठे का कम विकार,

शुष्के नीरे का कासार,

नाश्ते द्रव्ये का परिवार,

ग्नाठे तथ्वे का समसारा. (भज गोविन्दम…)


नारी स्थान भरा नाभि निवेसम,

मिथ्या मया मोहावेसम,

एथान माम्सवासाधि विक्रम,

मानसी विचिन्थाया वारं वारं. (भज गोविन्दम….)


कस्थ्वाम को अहम् कुता यथा?

का में जननी को में ठाठ.

इथी परिभावाया सर्वमसारम,

विस्वम त्याक्थ्वा स्वप्ना विचारम. (भज गोविन्दम….)


गेयं गीता , नामा सहस्रं,

ध्येयं श्री पाठी रूपमजस्रम,

नें सज्जना संगे चित्तं,

धेयम दीनाजनाया च विथं (भज गोविन्दम….)


यावाज्जेवो निवासथी देहे,

कुसलं थावाथ प्रुच्चाठी गेहे,

गथावाठी वायोऊ देहापाये,

बर्या भिब्यास्थी तस्मिन् कए. (भज गोविन्दम…..)


सुखधा क्रियाठे रमा भोग,

पस्चात्दंधा सरेरे रोग,

यद्यपि लोके मरणं सरनाम,

तदपि न मुन्चाठी पपचारानाम. (भज गोविन्दम…..)


रध्या चर्पता विरचिता क्कंधा,

पुन्यापुन्य विवार्जिथा पढ़ा.

नाहं नाथवा नायं लोक,

स्ताधापी किमर्थं क्रियाठे सोका. (भज गोविन्दम…..)


कुरुठे गंगा सागर गमनं,

वृथा परिपालना माधव धानम,

गणना विहीना सर्वमठेना,

मुक्त्हीं न भावाठी जन्मा सठेना. (भज गोविन्दम…..)


योग राठो वा भोगाराठो वा,

संग राठो वा संग विहीना,

यस्य ब्रह्मणि रमठे चित्तं,

नन्दाठी नन्दाठी नन्दथ्येवा. (भज गोविन्दम….)